8.6.10

रूठे रूठे पिया...मनाऊं कैसे

कुछ अनिवार्य कारणों से आपसे कई दिनों से मिल नहीं पाया.मेरी नई रचना का आनंद लिजिये.
एक बार हुआ यूं कि कविराज ने अपनी कविरानी से उनके मायके साथ चलने का वचन दिया था किंतु कुछ कारण वश नहीं जा सके. कविरानी बेचारी(?)अकेली चली गई और कविराज से रूठ गईं. कविराज ने उन्हे मनाने फोन लगाया और ये वार्तालाप हुआ.

- कैसी हो?
- अच्छी हूं.
- वो तो तुम हो ही, ये भी कोई कहने की बात है भला ?
- आपने पूछा इस करके बता रही हूं.
- क्या कर रही हो?
- सांस ले रही हूं.
- वो तो लेनी ही पड़ती है.
- कहो तो लेनी बंद कर दूं ?
- ओ यार मेरा ये मतलब नहीं था सांस लेने के अलावा
और क्या कर रही हो?
- पलकें भी झपका रही हूं.
- तुम ऐसी बातें क्यों करती हो
- अच्छा... आप कैसे हैं?
- अच्छा हूं.
- अपने मुंह मियां मिट्ठू
- क्या मैं अच्छा नहीं?
- तुम अच्छॆ नहीं, बहुत गन्दे हो.
- क्यों
- आये क्यों नहीं?
- अरे तुम्हें क्या बताऊं...
- कुछ भी बता दो...बता दो
- हे भगवान
- मुझे देखकर आप भगवान को क्यों याद करते हैं?
- मैं देख कहां रहा हूं केवल तुम्हें सुन रहा हूं.
- अच्छा जी जब मैं आपसे बात कर रही होती हूं तो
आप मुझे कल्पना में नहीं देखते?
- देखते हैं
- तो दिखती हूं न?
- वो तो...वो तो ऐसे है कि मैं भगवान को याद कर धन्यवाद करता हूं.
- काहे का धन्यवाद?
- यही कि हे प्रभु इतनी अच्छी पत्नी दी.
- अब मिल गई है न.बार बार भगवान को कष्ट क्यों देते हैं?
- उनसे प्रार्थना भी तो करता हूं.
- कैसी प्रार्थना?
- धन्यवाद करता हूं और और कहता हूं...
चलो जाने दो यार
- बताईये न...आपको मेरी कसम
- कहता हूं हे भगवान...जैसी अच्छी मिली है इसे वैसी ही अच्छी रखना.
- ओ...ह कोई काम है मुझसे ?
- क्यों?
- मक्खन क्यों लगा रहे हो?
- अब सच कहूं तो तुम विश्वास ही नहीं करती.
- अच्छा अच्छा यानी अभी सच कहा नहीं आपने
- क्यों नहीं कहा?
- क्योंकि मैं विश्वास नहीं करती
- मेरा मतलब है सच कहा तो भी तुम विश्वास क्यों नहीं करती?
- आप चाहते हैं आपकी इस बात पर मैं विश्वास कर लूं?
- मेरी अरजी तेरी मरजी.
- कवि हो न...बातें बनाना खूब आता है.
- मैं बनाता बातें तुम मुझे ही बना रही हो.
- आपको तो भगवान ने बना दिया है.भला मैं क्या बनाऊंगी?
- तुम एक भलेमानस को अमानुष बना रही हो.
- देखिये फोन पर कविता न करिये. पते की बात करिये.
- पते की बात सुन ही लो यदि तुम कल नहीं आई तो
मैं बेपता हो जाऊंगा
- हाय राम
- अभी नहीं तीन दिन बाद कहना.
- ओ मेरे सोना रे सोना रे सोनारे
- आ जाओ अब दूर नहीं रहना रे

15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत दिनों के बाद आपका शानदार और ज़बरदस्त पोस्ट पढ़कर बहुत अच्छा लगा! वाह क्या बात है आखिर इसीको मनाना कहते हैं! भला कविरानी के कहने पर कविराज उनके माइके नहीं गए अब तो कविराज जी को तो अपनी पत्नी को मनाना ही पड़ेगा क्यूंकि वो तो रूठी हुई थी अपने पतिदेव से !

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  2. मुझे फ़ोन पर बात करना नहीं आता था ।
    बहुत बहुत धन्यवाद आपसे मुफ़्त में
    कोचिंग मिल गयी । वो भी ए क्लास
    कोचिंग..मजेदार बातचीत
    satguru-satykikhoj.blogspot.com

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  3. वाह गुरुदेव !!! माफ़ करना कविवर महोदय !! कमाल की प्रेम कहानी फोन पर चलायी है !!! मज़ा आ गया फोन का बिल तो ज्यादा आया होगा !!! वैसे आपका मेरा मतलब है कविवर का गाना सुन कर कविरानी वापस आई क्या नहीं ? उत्तम अति उत्तम !!!

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  4. Bau jee, Namaste!
    Lot-pot ho gaye haste-haste!
    (Future me kaam aane wali gyan kee baate batayee hain aapne)
    Janiye,
    Kyun hota baadal banjaara.....?

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  5. ईश्वर आपकी तमन्ना पूरी करे.
    ..सुंदर पोस्ट.

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  6. ओ मेरे सोना रे सोना रे सोनारे
    - आ जाओ अब दूर नहीं रहना रे

    रोमांचक उत्तर - प्रत्युत्तर .....
    सोणी बड़ी जल्दी लौट आई .....!!

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  7. आप बडे़ वो हैं
    कविता को कविता कविता मे़ मना लेते हैं
    वाह !

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  8. Beautiful presentation of sweet fight between husband and wife presented in very hilarious way. I have read your previous post, which are great and yours blogger meet post was wonderful. Hope to see much more from you.

    Naresh Toshniwal,
    http://seo-hyd-india.blogspot.com

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  9. वाह क्या वार्तालाप हुआ है...!!
    एक दूसरे पर सही भारी पड़ते नज़र आये हैं ..
    बहुत खूब ...बहुत पसंद आई आपकी प्रस्तुति...
    शुक्रिया...

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  10. सुन्दर एवं दिलचस्प वार्तालाप है अपनी कविता से।

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  11. वो तो शुक्र है कि पत्नी भी कवयित्री है,वरना तो कवियों का जीना मुहाल होता है!

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