3.12.09

आधुनिक स्वयंवर


आज विज्ञान हर जगह घुसा हुआ है, आप जितना सोच सकते हैं उससे भी कहीं अधिक. कैसे? मेरी इस हल्की-फुल्की कविता का आनंद लिजिये. 

 .

           एक दिन पहुंचे

           मित्र के घर

           कविराज

           चा चू पी

           कहा यार

           बिटिया विवाह

           योग्य हो गयी है

           कोई बढि़या वर ढूंढो

           मित्र बोला अपनी चिंता

           वही स्वंय  कर रही हैं

           अपना स्वंयवर कर रही है

           कविराज चक्कर खा गये

           बोले यार पहेलियां

           मत बुझाऒ

           बात क्या है?

           साफ़ साफ़ बताऒ

           मित्र मुस्कुराये

           बोले बन्धु उस कमरे में

           रिंकी

           वर चुन रही है

           तुम्हारी भाभी उसकी

           हेल्प कर रही है

           दोनों इंटरनेट पर

           मेट्रोमोनिअल साईट्स

           सर्फ कर रही हैं

6.11.09

हास्य रस और श्रृंगार रस

एक बार हमने कविराज से पूछा नौ रसों से आपने अपनी कविताओं के लिये हास्य रस ही क्यों चुना?
कविराज बोले हास्य रस लिखना बहुत कठिन है विशेषता यह है कि यह रस हर रस में रम जाता है 
और रचना में हमें, श्रोता और पाठक सबको रस आ जाता है, इसीलिये हम इस रस का रस लेते-देते हैं.हमने कहा कोई उदाहरण दिजिये कविराज बोले मेरी ये कविता पढ़िये. 
इसमें हमने श्रृंगार रस में हास्य रस मिलाया है. 

श्रृंगार रस 

जन्म दिन का 
था अवसर 
पहुंची श्रीमती कविराज 
ब्यूटी पार्लर 
लेप लगवाया 
चमड़ी घिसवाई 
जूडे की नई स्टाइल बनवाई 
गजरा टांग नई साडी 
नये ढंग से बंधवाई 
गुनागुनाती घर आई 
कविराज से बोली 
बडे कवि बन अकड़े हो
हास्य रस में लिथड़े हो 
सुनो सजनवा 
देखो मुझे   
प्रेरणा पाओ 
श्रृंगार रस में आ जाओ 
मुझे ... मेरे रूप को 
सराहो 
आज तक किसी ने 
किसी को नहीं दी 
ऐसी अछूती उपमा दे 
इसका 
मान बढाओ 
कविराज ने 
नयन भर 
श्रीमती जी को देखा 
कहा वाह वाह 
क्या खूब लग रही हो 
श्रीमती जी प्रेमल हुई
नयन मूंदे, मुस्काई 
बोली और....आगे कहो न 
कविराज बोले प्रिये 
रूप तुम्हारा 
अतिशय सुंदर 
मेरे मन भायी हो 
लग रही हो ऐसे 
जैसे ब्लैक एंड व्हाईट 
मुगलेआजम 
नई टेक्नोलाजी से 
नये रूप में 
टेक्नीकलर 
हो के आई हो 
..................विजय प्रकाश 
(  कविराज.इन  से साभार)

28.10.09

पति-पत्नी और शेर


माना शेर शेर होता है किंतु उसे भी पालतू बनाया जाता है इसके लिये शेर को पकड़ना होता है
पकड़ने के लिये 1- उसे बकरी दिखाई जाती है वह ललचा जाता है गड्डे की ओर आता है नहीं आता तो 2- हांका लगाया जाता है 3- उसे कुछ नहीं सूझता और वह गड्डे में गिर जाता है पकड़ाई हो जाती है .
फिर उसे पालतू बनाने का काम शुरु होता है. साधारणतयाः यह प्रक्रिया लगभग विवाह जैसी ही है.
1- लड़की दिखाई जाती है, नहीं मानता तो 2- संबंधियों द्वारा समझाया जाता है.
3- विवाह संपन्न होता है 
और आगे शेर क्षमा करें पति कैसे फालतू उंह...पालतू बनता है, देखिये:-
पति - ठीक है यार मैं ही गलत हूं. अब जाने दो गुस्सा थूक दो. हाथ जोड़ता हूं
पत्नी - अब मैंने ऐसा क्या कह दिया जो हाथ जोड़ रहे हो, पांव पड़ रहे हो.
पति - आं... मैंने पांव पड़ने वाली बात कहां कही? कब कही?
पत्नी - देखिये आप अब नई बहस शुरु कर रहे हैं.
पति - मैं कर रहा हूं ?
पत्नी - ना जी बहस मैं ही करती हूं न मैं ही गलत हूं
पति - मैं मान चुका हूं कि मैं गलत हूं.
पत्नी - छोड़िये, उपर के मन से मान रहे हो.
पति - उपर-नीचे-आगे-पीछे-अंदर-बाहर सभी मनों से मान रहा हूं
पत्नी - यानी मान रहे हो कि उपर के मन से..
पति - ओफ्फओह, बस करो 
पत्नी - अच्छा अब मेरी बात सुनना भी गवारा नहीं?
पति - अरे बाबा सुन तो रहा हूं.
पत्नी - क्या खाक सुन रहे हो. बताओ मैंने क्या कहा?
पति - यही कि मैं तुम्हारी बात नहीं सुनता.
पत्नी - आ गई न मन की बात मुंह पर.
पति - अब तुम खुद ही..
पत्नी - अब कह दो मैं गलत हूं. 
पति - मैंने कब कहा?
पत्नी - तो कौन सी कसर रख दी कहने में?
पति - अभी छोड़ो यार
पत्नी - हां हां अभी छोड़ो, गरज रहती है तब हाथ जोड़ो.
पति - अब मैं क्या कहूं, क्या करूं?
पत्नी - ऊं...हूंऊऊऊ..हूंऊऊऊ...हूंऊऊऊ
पति - अच्छा बाबा चुप हो जाओ मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूं और पांव भी पड़ता हूं.बस्स्स्स्स.

22.10.09

क्यों प़टाखे फुस्स इनके क्यों बुझ गये दिये

चलिये दीपावली हो गयी चुनाव भी हो गये हार जीत के परिणाम भी आ गये.
हार ... क्या विचित्र वस्तु है हार. लिंग बदलते ही अर्थ बदल जाते हैं किसी के गले पड़ा,
किसी के गले पड़ी. विजयी की जय जय हारे को हरि नाम
हम आपको एक "हारे" नेता की बात बताते है आईये आपको "फ्लैश बेक" में ले जाते हैं.
कई वर्ष पूर्व ये नेता राय साब के पास आये थे. बोले अगले चुनाव में विजयी होना चाहता हूं
आपकी राय चाहिये कोई मंत्र दिजिये.
राय साब बोले सेवा और सेवा, यही विजय का मूल मंत्र है.आप चुनाव तक केवल सेवा ही करते रहें।
सेवा से ही मेवा मिलेगा.
नेता बोले प्रश्न उठता है सेवा किसकी करें?
राय साब बोले आपके मन में भी प्रश्न उठते हैं? वैसे आप चुनिये किसकी सेवा करना उचित रहेगा-
जनता की? हाई कमांड की? प्रदेश अध्यक्ष की? भूतपूर्व की? वर्तमान की? ईंडस्ट्रियलिस्ट की? बाबा की? ज्योतिषी की?
नेता जी बोले आप ही सुझाईये
राय साब बोले अरे भई थोड़ी कम थोड़ी अधिक, इसकी उसकी, सबकी सेवा करते रहें, तभी तो लहर किनारे लगेगी.
नेता जी प्रसन्न हो गये, अभिवादन किया और निकल पड़े.
उन्होने मूलमंत्र याद रखा, सबकी बहुत सेवा की, टिकट पाया, चुनाव-समर में आये.
किंतु...बेचारे सबकी सेवा में इतने व्यस्त हो गये कि समय ही नहीं मिला और केवल जनता की सेवा ही भूल गये.
फिर ये तो होना ही था जनता भी इन्हें मतदान के समय...
यहां पर आपकी हमारी बात पूरी होती है
क्यों प़टाखे फुस्स इनके क्यों बुझ गये दिये
क्योंकि इन्हें मतदाताओं ने मत नहीं दिये
.





15.10.09

धन ही धन्य है

दीपावली का पर्व आज से प्रारंभ हो चुका है. यूं तो वर्ष भर हम सभी किसी न किसी प्रकार से धन की देवी श्री लक्ष्मी माता की आराधना करते ही रहते है.किंतु इन तीन दिनों का अधिक महत्व है.
आप-हम सभी जानते हैं, आज अर्थ है तो कुछ अर्थ है नहीं तो सारा कुछ निरर्थक है, अन्य अन्य ही है केवल धन ही धन्य है.
आप-हम बहुत सारा धन कमाऐं, खूब सारा खर्चें ताकि दूसरे भी धन कमा सके, इसी कामना के साथ आपकी हमारी के सभी पाठकों, टिप्पणीकर्ताओं एवं चिठ्ठाकर्ताओं को मेरी ओर से दीपोत्सव की हार्दिक बधाई. आपके लिये उपहार स्वरूप मेरी एक धन के महत्व को बताती कविता, और मेरी कुछ क्षणिकाऐं प्रस्तुत हैं.प्रयोग के तौर पर मैंने इन्हें दृष्य़-पटलों(slides) पर प्रकाशित किया है.
इसे आप full screen का बटन दबा कर देखें तो अधिक आनंद आयेगा.पूरी स्क्रीन पर केवल कविता और कुछ भी नहीं. आहा... लगेगा जैसे किसी नायिका की सुंदरता को "क्लोज-अप" में देख रहे हैं.आनंद लिजिये.

और ये रही मेरी कुछ क्षणिकाऐं...

9.10.09

सपना या सच

बंधुओं, चुनावों की ऋतु आ गयी है. कुछ प्रदेशों में तमाशा चालू आहे.
भिन्न भिन्न नेता मतदाताओं पर भिनभिना रहे हैं,लुभा रहे हैं.तरह तरह से ललचा रहे हैं साथ ही विपक्षियों पर भिन्ना रहे हैं.  
आजकल हम बूद्धू बक्से पर "सीरियल" नहीं देखते, नेताओं के भाषण सुनते हैं. इनमें अधिक "सस्पेंस" है. आज फलाने ने ढिलाने को चूहा कहा कल ढिलाना फलाने को क्या कहेगा? फिर सयाना की  प्रतिक्रिया क्या होगी?
लगता है जैसे अमका नेता और ढिमका नेता,  बंद नेता और चालू नेता, गरज ये के सभी नेता कह रहे हैं - समय बिताने के लिये... ओह क्षमा करें...
विजय पाने के लिये/करना है कुछ काम
खेलें आरोपों की अंताक्षरी/लेके मतदाता का नाम
सच मानिये यह सब देख सुन हमारा मन मनोरंजन से भर जाता है, ह्रदय भारी हो मस्तिष्क भरकम हो जाता है. 
एक हमारे मित्र हैं. नऐ-नऐ पत्रकार बने हैं.बेचारे आजकल रात दिन नेताजी के साथ "चिगी-विगी" कर रहे हैं जन सभाओं को "कवर" कर रहे हैं. नेता जी के संग-साथ से चार दिनों के प्रवास से उनके कोमल मन मस्तिष्क पर क्या बीती उन्होनें कविराज को बताई और हम आपको बताते है.
पढ़िये. 
सपना और सच
पत्रकार जी ने कहा 
कल देखा सपना  
चकित हूं  
कृपया इसका अर्थ 
बताईये 
कविराज बोले 
ऐसा क्या देख लिया 
सुनाईये 
पत्रकार बोले देखा मैंने
एक विशाल बरगद 
उस पर बैठे थे कौऐ 
कौओ का रंग था धवल श्वेत 
चोंचे खोल हंस रहे थे 
आश्चर्य की बात
मोती झड़ रहे थे   
कुत्ता और बिल्ली साथ साथ 
नाच रहे थे डुऐट गा रहे थे
मेंढक अपने आप को 
फुला रहे थे
टर्रा नहीं गुर्रा रहे थे
सांप डसना फुंकारना छोड
अपना फन सिकोड 
सीधे चल रहे थे
गाय को शेर            
प्यार से सहला रहे थे
हरी हरी घास दिखा रहे थे
इतना देखा बस
फिर मैं जग गया
कविराज ने ठहाका लगाया
बोले बंधु तुम्हारे सपने पर 
चुनावी प्रभाव है आया 
सपने का अर्थ ऐसा है
बरगद का वृक्ष हमारा भारत देश 
कौऐ नेता हैं 
चुनाव ऋतु है
श्वेत हो गये हैं
चोंच खोल भाषण दे रहे हैं
आश्वासन रूपी मोती झड रहे हैं
शेर नेताओं के गुर्गे हैं चमचे है
मना रहे हैं 
मतदाता गाय है 
और ये उसे पटा रहे हैं
कुत्ते और बिल्ली  
उत्तर दक्षिण हैं अर्थात
भिन्न भिन्न विचारधारा
वाले छोटे-मोटे दल
हो गया है जिनका तालमेल
मेंढक छोटे छोटे प्रांतीय दल हैं
स्वंय को फुला रहे है
भाव बडा रहे हैं
सांप दफ्तर हैं सरकारी अफ़सर हैं
सबका कार्य हो रहा है कर रहे हैं
इस अवसर पर सीधे चल रहे हैं
पत्रकार बोले वाह कविराज
आपने तो वाट लगा दी
सपने की पहेली सुलझा दी
कविराज बोले वो सपना था
अब आगे की सच्चाई सुनिये
बरगद तो वहीं रहेगा
कुछ पुराने कौऐ उड़ जायेंगे 
कुछ नऐ आ जायेंगे 
काले हो जायेंगे फिर से
पांच साल के लिये बस जायेंगे 
आज मोती झड़ रहे हैं
कल बीट गिरायेंगे
कुत्ते बिल्ली हर बात पर अड़ेंगे
फिर से लड़ेंगे झगड़ेंगे  
मेंढक इतना फूलेंगे कि 
टुकड़े भी नहीं मिलेंगे 
सांप फिर से गायों को 
डसने लगेंगे टेड़े चलने लगेंगे
शेर आयेंगे गाय को सतायेंगे 
वो रम्भायेगी 
कौऐ सुनेंगे समझायेंगे
निचोड़ेंगे दुहेंगे पियेंगे पिलायेंगे  
जब तक दूध देगी
कृपा करेंगे गाय को बचायेंगे
हमने कहा और इसके आगे
कविराज बोले इसके आगे तो
बंधु हमारी नियति ही बतायेगी
गाय जिसे तिसे दूध पिला रही है
पता नहीं इसे कब बुद्धि आयेगी
पता नहीं इसे कब बुद्धि आयेगी
.........................................
                         विजयप्रकाश

6.10.09

अथः प्रेमी-प्रेमिका "चैट"

दो कंप्यूटर कर्मी प्रेमी-प्रेमिका चैट कर रहे थे उसी समय हमारे कविराज का "क्रास-कनेक्शन" लग गया.  उन्होने इस"चैट"को "शेयरवेयर"कर दिया हैं. आप भी आनंद लिजिये.
प्रेमी - हाई 
प्रेमिका - हाई 
प्रेमी - और कैसे चल रहा है?
प्रेमिका - अच्छी "स्पीड" है.
प्रेमी - आजकल तो "कनेक्ट" ही नहीं होती. कभी मेरी "आई.डी."  पर भी "माऊस" "क्लिक" कर दिया करो.
प्रेमिका - क्या करूं यार अभी मेरे "सिस्टम" पर बहुत "लोड" है.
प्रेमी - अरे थोड़ी बहुत "फ़ीड" तो "एक्टिव" रखो ना.
प्रेमिका - ये "रिमाइंडर" क्यों दे रहे हो?
प्रेमी -  क्योंकि हमारे -तुम्हारे बीच कोई "वायरस" घुस गया है.
प्रेमिका - ये "स्पैम" बंद करो यार.
प्रेमी -  आजकल उस विजय की "साईट"पर बहुत "विजिट" हो रही है न.
प्रेमिका - हा...हा...मैं तो बस ऐसे ही थोड़ी बहुत "अपडेट" हो रही हूं.
प्रेमी - उससे बच कर रहना.वो "मालवेयर" तुम्हें "फ़्रीवेयर" बना देगा . 
प्रेमिका - वो तो "इवाल्यूएशन स्टेज" में है.
प्रेमी - ओह गोड, यानी "डाऊनलोड" कर लिया?
प्रेमिका -तुम तो यार खामखां "स्पाईवेयर" बन रहे हो.
प्रेमी - अरे ट्राई टू अंडर स्टैंड यार. उसे अपनी लाईफ से "डीलीट" कर दो.
प्रेमिका - क्या करूं? ट्राई किया था, "अनेबल टू डीलीट" आ रहा है.
प्रेमी - ओह गोड, तुम कहीं "करप्ट" तो नहीं हो गयी?.
प्रेमिका - नानसेंस, अभी "अपलोड" ही नहीं किया. 
प्रेमी - लीव ईट यार... चलो मेरा "स्टेटस" बताओ.
प्रेमिका -तुम भी तो "ट्राएल वर्सन" में ही हो.
प्रेमी - मैं तो अपने आप को "इंस्टाल्ड" समझ रहा था.
प्रेमिका - अभी तुम्हारा हमारा "कान्फिगरेशन" ही नहीं हुआ और तुम...
प्रेमी - ऐसे "मालफंक्शन" क्यों कर रही हो?
प्रेमिका -तुम क्यों "ईनफेक्टड" हो रहे हो ? मैं तो ठीक हूं अपनी "सेटिंग" चेक करो.
प्रेमी - चलो छोड़ो, शाम को वहीं मिलते हैं "री-फोरमेटिंग" करते हैं.
प्रेमिका -लगता है तुम्हारा "पेज""री-फ़्रेश" करना पड़ेगा.
प्रेमी -यार तुम तो "साफ्टवेयर" से "हार्डवेयर" हो रही हो.
प्रेमिका - ज्यादा "ब्लिंक" न करो, मैं "लिंक ब्रेक" कर रही हूं.
प्रेमी -पहले अपने मन को तो "सर्च" कर लो.
प्रेमिका - "फ़ायरवाल""ओन"
प्रेमी - यार ऐसे न करो. मेरा "सी.पी.यू." "कोलेप्स" हो जाएगा.
प्रेमिका - "रीप्लेस" करवा लेना.
प्रेमी - प्लीज..प्लीज
प्रेमिका - गो टू  "री-साईकल बिन" .
............................?
......................................................
&#^*!!!!!!!. 
बस जी आगे हमारा भी "लिंक ब्रेक"हो गया.

28.9.09

रावण

सभी पाठकों को दशहरे की शुभकामनाऐं.अच्छाई की बुराई पर विजय का पर्व है दशहरा.राम जी की रावण पर विजय का पर्व है दशहरा.
वैसे ये बात सभी को पता नहीं होगी कि रावण बहुत विद्वान थे, उन्होनें ज्योतिष के एक ग्रन्थ की रचना भी की थी.
केवल एक बुरे कर्म से व्यक्ति क्या से क्या हो जाता है रावण इसके एक अच्छे उदाहरण हैं.अतः हमें भी अपने अंदर की बुराई को जलाना चाहिये. यही सार है दशहरे का. और वैसे आज भी रावणों की कमी नहीं एक ढूंढो हजार मिल जाते हैं.
इस संदर्भ में मुझे अभी पंद्रह अगस्त को कवि नीरज के सानिध्य में संपन्न हुई कवि गोष्ठी में हैद्राबाद की शान प्रसिद्ध कवि वेणुगोपाल भट्टड़ द्वारा रावण और आज कल के नेताओं की तुलना में पढ़ी गयी ये क्षणिका याद आ रही है.
रावण दस मुख से एक बात करते थे
नेता एक मुख से दस बात करते हैं.
पुनः आपसे शीघ्र ही भेंट होगी.

25.9.09

Raja Ravi Varma

राजा रवि वर्मा के चित्रों को देखिये

24.9.09

पहली बात

सभी पाठकों को यथायोग्य अभिवादन.
कई दिनों से कई धाकड़ लिक्खाड़ों के बलाग्स पढ़ रहा था,
कुछ टिप्पणियां भी टीपी. और मुझे भी अपने विचार और रचनाऐं
(हास्य-व्यंग की कविताऐं रचता हूं) आपसे बांटने की इच्छा हुई.
फलस्वरूप "आपकी हमारी" का प्रादुर्भाव हुआ.इस माध्यम के द्वारा आप मुझ से
और मैं आपसे जुड़ा रहूंगा और आपका प्यार भी मिलेगा यह विश्वास भी है.
एक स्वरचित क्षणिका का आनंद लिजिये.
परिवर्तन
मैं श्रीमती बेईमानी
धर्म-पत्नी लालच कुमार
निवासी कलियुग नगर
अपना नाम परिवर्तित कर
श्रीमती चतुराई रख रही हूं

शेष फिर
 
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