28.10.09

पति-पत्नी और शेर


माना शेर शेर होता है किंतु उसे भी पालतू बनाया जाता है इसके लिये शेर को पकड़ना होता है
पकड़ने के लिये 1- उसे बकरी दिखाई जाती है वह ललचा जाता है गड्डे की ओर आता है नहीं आता तो 2- हांका लगाया जाता है 3- उसे कुछ नहीं सूझता और वह गड्डे में गिर जाता है पकड़ाई हो जाती है .
फिर उसे पालतू बनाने का काम शुरु होता है. साधारणतयाः यह प्रक्रिया लगभग विवाह जैसी ही है.
1- लड़की दिखाई जाती है, नहीं मानता तो 2- संबंधियों द्वारा समझाया जाता है.
3- विवाह संपन्न होता है 
और आगे शेर क्षमा करें पति कैसे फालतू उंह...पालतू बनता है, देखिये:-
पति - ठीक है यार मैं ही गलत हूं. अब जाने दो गुस्सा थूक दो. हाथ जोड़ता हूं
पत्नी - अब मैंने ऐसा क्या कह दिया जो हाथ जोड़ रहे हो, पांव पड़ रहे हो.
पति - आं... मैंने पांव पड़ने वाली बात कहां कही? कब कही?
पत्नी - देखिये आप अब नई बहस शुरु कर रहे हैं.
पति - मैं कर रहा हूं ?
पत्नी - ना जी बहस मैं ही करती हूं न मैं ही गलत हूं
पति - मैं मान चुका हूं कि मैं गलत हूं.
पत्नी - छोड़िये, उपर के मन से मान रहे हो.
पति - उपर-नीचे-आगे-पीछे-अंदर-बाहर सभी मनों से मान रहा हूं
पत्नी - यानी मान रहे हो कि उपर के मन से..
पति - ओफ्फओह, बस करो 
पत्नी - अच्छा अब मेरी बात सुनना भी गवारा नहीं?
पति - अरे बाबा सुन तो रहा हूं.
पत्नी - क्या खाक सुन रहे हो. बताओ मैंने क्या कहा?
पति - यही कि मैं तुम्हारी बात नहीं सुनता.
पत्नी - आ गई न मन की बात मुंह पर.
पति - अब तुम खुद ही..
पत्नी - अब कह दो मैं गलत हूं. 
पति - मैंने कब कहा?
पत्नी - तो कौन सी कसर रख दी कहने में?
पति - अभी छोड़ो यार
पत्नी - हां हां अभी छोड़ो, गरज रहती है तब हाथ जोड़ो.
पति - अब मैं क्या कहूं, क्या करूं?
पत्नी - ऊं...हूंऊऊऊ..हूंऊऊऊ...हूंऊऊऊ
पति - अच्छा बाबा चुप हो जाओ मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूं और पांव भी पड़ता हूं.बस्स्स्स्स.

22.10.09

क्यों प़टाखे फुस्स इनके क्यों बुझ गये दिये

चलिये दीपावली हो गयी चुनाव भी हो गये हार जीत के परिणाम भी आ गये.
हार ... क्या विचित्र वस्तु है हार. लिंग बदलते ही अर्थ बदल जाते हैं किसी के गले पड़ा,
किसी के गले पड़ी. विजयी की जय जय हारे को हरि नाम
हम आपको एक "हारे" नेता की बात बताते है आईये आपको "फ्लैश बेक" में ले जाते हैं.
कई वर्ष पूर्व ये नेता राय साब के पास आये थे. बोले अगले चुनाव में विजयी होना चाहता हूं
आपकी राय चाहिये कोई मंत्र दिजिये.
राय साब बोले सेवा और सेवा, यही विजय का मूल मंत्र है.आप चुनाव तक केवल सेवा ही करते रहें।
सेवा से ही मेवा मिलेगा.
नेता बोले प्रश्न उठता है सेवा किसकी करें?
राय साब बोले आपके मन में भी प्रश्न उठते हैं? वैसे आप चुनिये किसकी सेवा करना उचित रहेगा-
जनता की? हाई कमांड की? प्रदेश अध्यक्ष की? भूतपूर्व की? वर्तमान की? ईंडस्ट्रियलिस्ट की? बाबा की? ज्योतिषी की?
नेता जी बोले आप ही सुझाईये
राय साब बोले अरे भई थोड़ी कम थोड़ी अधिक, इसकी उसकी, सबकी सेवा करते रहें, तभी तो लहर किनारे लगेगी.
नेता जी प्रसन्न हो गये, अभिवादन किया और निकल पड़े.
उन्होने मूलमंत्र याद रखा, सबकी बहुत सेवा की, टिकट पाया, चुनाव-समर में आये.
किंतु...बेचारे सबकी सेवा में इतने व्यस्त हो गये कि समय ही नहीं मिला और केवल जनता की सेवा ही भूल गये.
फिर ये तो होना ही था जनता भी इन्हें मतदान के समय...
यहां पर आपकी हमारी बात पूरी होती है
क्यों प़टाखे फुस्स इनके क्यों बुझ गये दिये
क्योंकि इन्हें मतदाताओं ने मत नहीं दिये
.





15.10.09

धन ही धन्य है

दीपावली का पर्व आज से प्रारंभ हो चुका है. यूं तो वर्ष भर हम सभी किसी न किसी प्रकार से धन की देवी श्री लक्ष्मी माता की आराधना करते ही रहते है.किंतु इन तीन दिनों का अधिक महत्व है.
आप-हम सभी जानते हैं, आज अर्थ है तो कुछ अर्थ है नहीं तो सारा कुछ निरर्थक है, अन्य अन्य ही है केवल धन ही धन्य है.
आप-हम बहुत सारा धन कमाऐं, खूब सारा खर्चें ताकि दूसरे भी धन कमा सके, इसी कामना के साथ आपकी हमारी के सभी पाठकों, टिप्पणीकर्ताओं एवं चिठ्ठाकर्ताओं को मेरी ओर से दीपोत्सव की हार्दिक बधाई. आपके लिये उपहार स्वरूप मेरी एक धन के महत्व को बताती कविता, और मेरी कुछ क्षणिकाऐं प्रस्तुत हैं.प्रयोग के तौर पर मैंने इन्हें दृष्य़-पटलों(slides) पर प्रकाशित किया है.
इसे आप full screen का बटन दबा कर देखें तो अधिक आनंद आयेगा.पूरी स्क्रीन पर केवल कविता और कुछ भी नहीं. आहा... लगेगा जैसे किसी नायिका की सुंदरता को "क्लोज-अप" में देख रहे हैं.आनंद लिजिये.

और ये रही मेरी कुछ क्षणिकाऐं...
 
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