6.4.10

नमक सत्याग्रह

नमक सत्याग्रह
आप सभी जानते है कि गांधी जी ने नमक सत्याग्रह किया था अंग्रेज सरकार को झुका कर छठी का नमक याद दिलाया था. आज ही के दिन 1930 को इस सत्याग्रह का समापन हुआ था. उस सत्याग्रह को पूरी महत्ता देते हुए हम अपने पाठकों को एक और नमक सत्याग्रह के बारे में बता रहे हैं, इसे किसने ने किया और कौन झुका...पढ़िये और आनंद लिजिये.

पहला दिन
कविराज - दाल में थोड़ा नमक अधिक लग रहा है.
कविरानी - ( चख कर) मुझे तो सही लगता है.
- तुम्हे लगने से क्या होता है ? मुझे लगना चाहिये.
- सभी ने दाल खाई किंतु किसी ने नहीं कहा
- तो क्या मेरा स्वाद बिगड़ गया है.
- अब मैं कैसे कहूं.
- क्या मतलब?
- जी कुछ नहीं
- एक बात समझ लो, अधिक नमक स्वास्थ्य के लिये ठीक नहीं होता.
- समझ गई जी कल से कम डलेगा.
कविराज - हूं..उ उ उ उ उ... उ...
कविरानी - .................................
दूसरा दिन
कविराज - आज दाल और सब्जी दोनों ही फीकी है.
कविरानी - आप ही ने कहा था कि नमक कम...
- तो इतना कम थोड़े ही कहा था.
- मैंने तो केवल थोड़ा सा कम...
- अरे यार ज्यादा कम हो गया है.
- जी मैंने तो...
- लगता है तुम्हे फिर से A B C D सीखनी होगी.
- जी कभी कभी हो जाती है गलती
कविराज - ऐसे कैसे हो जाती है ?
कविरानी - ..................
तीसरा दिन
कविराज - ओफ्फो... आज तो हद हो गई.
कविरानी - क्या हो गया?
- इस दाल में नमक है ही नहीं.
- सारी...भूल गयी हूंगी.
- वाह-वाह...शाबाश...
- अब क्या हुआ ?
- क्या हुआ ? चखो इसे, सब्जी में नमक दुगना है.
- हाय राम, शायद दो बार डल गया.
- अब मैं क्या करूं ?
- अब मैं क्या कहूं ?
- यही कहो रहने दिजिये, फिर फेंक दोगी.
पता है सब्जी मेवे के भाव और तेल घी के भाव आ रहा है.
कविरानी- ..................................
- बस मुंह बंद कर लेती हो....कुछ तो कहो.बताओ कैसे खांऊ?
- आप गुस्सा हो जायेंगे.
- नहीं नहीं बताओ तो सही.
- दाल में नहीं है सब्जी में दुगुना है दोनों को मिला लो, नमक सही हो जाऐगा.
- अच्छा सुझाव है. हूंउउ...ऐसे मिला कर कोई खाता है भला ?
- भीतर तो सब मिलेगा न, बाहर मिल जाये तो क्या हुआ.
कविराज - धन्य हो...
कविरानी - ................................................
चौथा दिन
कविराज - आज क्या बात है ? दाल और सब्जी सब में नमक बिल्कुल सही है.
कविरानी - (मुस्कुराते हुए) अब मैं क्या कहूं.
- यही कहो न...हो जाती है कभी कभी...गलती
- आपका भी जवाब नहीं
- क्यों ?
- कम हो तो सुनाते हो, ज्यादा हो तो सुनाते हो, सही हो तो भी सुनाते हो...
- आदत नहीं न है ऐसा सही खाने की
- आपको तो आदत मुझे ही कुछ न कुछ कहने की है. है न ?
कविराज - छोड़ो यार मैं तो हंसी कर रहा हूं.
कविरानी - ..........................................
पांचवा दिन
कविराज - ओफ्फोह...जरा सुनना
कविरानी - जी कहिये
- आज न तो दाल में नमक है न ही सब्जी में.
- जी हां नहीं है पता है.
- क्या मतलब ?
- जान बूझ कर नहीं डाला.
- हांये..क्यों नहीं डाला ?
- देखिये इस कम ज्यादा के चक्कर से दुखी होकर सोचा कि...
- सोचा कि बिना नमक का खिला दूं.
- जी नहीं.ये नमकदानी रखी है.जितना आपको लगता है, ले लिजिये.
- मुझसे हंसी कर रही हो ?
- ये हंसी नहीं, नमक सत्याग्रह है.प्रति दिन भोजन बिना नमक ही बनेगा.बस्स
कविराज - जो भी हो ठीक नहीं कर रही हो.
कविरानी - ..................................
छठा दिन
कविराज - एक बात कहना चाहता हूं
कविरानी - कहिये न
- देखो पति की बातों का बुरा नहीं मनाते.
- तो
- तुम्हे अच्छा नहीं लगा न, आगे से मैं नमक के बारे में कुछ भी नहीं कहूंगा.बस ये...
- नमक सत्याग्रह वाली बात... आज समाप्त...वो तो हंसी की थी.
- तो क्या ...
कविरानी - चखिये न...नमक बराबर है.
कविराज -.......................................

14 टिप्‍पणियां:

  1. BEHAD SUNDAR

    कविरानी - चखिये न...नमक बराबर है.
    कविराज -.......................................

    BAHUT ACHA LAGA PAD KAR AAP

    SHEKHAR KUMAWAT

    http://kavyawani.blogspot.com/

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  2. हास्य व्यंग्य से ओतप्रोत रचना के लिए बधाई।
    इस पर तो नौंटकी खेली जा सकती है।
    वाह!

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  3. sir namak khakar maza aaya........

    lekin apne sirf 6 din ke satyagrah ka hi warnan kiya hai matlab saatwe din bhabhiji khana nahi banati.....outing rakhte ho........bahut khoob!!!!!

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  4. सर्वप्रथम मेरे ब्लॉग पर आ कर इस महामूर्खराज की हौसला अफजाई के लिए हार्दिक धन्यवाद ।
    अदभुत रचना है है आपकी यह नमक सत्याग्रह और हास्य व्यंग अनूठी जुगालबंदी बस लगे रहिए और हमें अपना कायल बनाते रहिए

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  5. ek gaane mein suna tha " jubaan par laga re... namak ishq ka " waakey bhale aapne namak kabhi jyada kabhi kam kahaya kintu mahoul meetha ho gaya ! bhaut khoob ! uttam !ati uttam ! hum to kehtey hai uttam ka bhi baap ............

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  6. यही तो है खट्टी मिट्ठी लाईफ.. और कभी कभी नमकीन भी :)

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  7. बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! एक नए अंदाज़ में लाजवाब प्रस्तुती! बहुत बहुत बधाई!

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  8. namak ke bahane... aapne puri jindgi ko baya kar diya... mujhe iss rachna me hansi-vynag nahi balki zindgi ki bebsi... zindgi ka dard... jyada dikha... sahajta se samaparan se.. saamanjsy se hi zindig chalti hai.. bahut umda aur innovative rachna

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  9. आजकल जहाँ हास्य के नाम पर अश्लीलता परोसी जाती है,वहाँ ऐसा स्वस्थ हास्य पढ़कर बहुत अच्छा लगा|वैसे सोचती हूँ आपने इस हास्य के बहाने एक कारगर शस्त्र से परिचय करा दिया..."नमक सत्याग्रह"

    सधन्यवाद..

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  10. अनूठी रचना ....!!
    बेचैन आत्मा जी ने सही कहा इस पर नौटंकी खेली जा सकती है .....!!

    बहुत खूब ....बहुत दिनों बाद कुछ ऐसा पढने को मिला .....!!

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  11. सभी दृष्टि से आपकी, रचना अति नमकीन।
    पढ़ो इसे जितना, लगे उतनी अधिक हसीन॥
    सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

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  12. vaha bahut sahee likha hai aapane---achchhaa vyangya aur behatareen prastuti.
    Poonam

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