कहते हैं पुरुष के भाग्य को और स्त्री के मन की बात को जानना असंभव हैं.
हो सकता है किंतु स्त्री यदि पत्नी के अवतार में हो तो यह बात सत्य प्रतीत होती है.
उदाहरण के लिये प्रस्तुत है कविराज और कविरानी का यह वार्तालाप. आनंद लिजिये...
- अजी सुनिये
- सुनाईये
- देखिये तो मैंने नई साड़ी पहनी है. कैसे लग रही है ?
- वाह...बहुत सुंदर लग रही है.
- साड़ी ही सुंदर लग रही है. मैं कुछ भी नहीं?
- तुमने साड़ी के बारे में पूछा तो...
- तो अब अपने मुंह से कहूं कि मेरी प्रशंसा करो.
- नहीं मेरे कहने का ये अर्थ नहीं है.
- हूं...
- अच्छा रूठती क्यों हो.सुनो, कविता द्वारा तुम्हारी प्रशंसा करता हूं.
- चलो ठीक है करिये.
- चंदन जैसे बदन पर ये साड़ी लिपटी है...
- ये क्या प्रशंसा हुई ? लिपटी है... साड़ी न हुई नागिन हो गई.
- नागिन कैसे ?
- और क्या चंदन से नाग-नागिन ही तो लिपटते हैं
- वैसे मैं भी तो...चलो छोड़ो...मेरी कविता तो पूरी होने दो न.
- ठीक है करो न.
- चंदन जैसे बदन पर ये निराली साड़ी लिपटी है
- क्या?
- ओह..चंदन जैसे बदन पर निराली साड़ी सजी है
- हां....
- चंदन जैसे बदन पर
निराली साड़ी सजी है
अंग तुम्हारे लग कर
साड़ी खूब खिली है
- अर्थात मैंने पहनी इसलिये ये साड़ी सुंदर लग रही है, वैसे सुंदर नहीं है?
- ओफ्फोह...समझा करो...
- क्या समझूं ? प्रशंसा करनी तो आती नहीं और कवितायें करते हो.
- ओ यार चलो...साड़ी और तुम दोनों ही सुंदर हो.बस्स्स...
- प्रशंसा कर रहे हो या नौकरी भुगता रहे हो.
- अब तुम ही बताओ प्रिये कैसे करूं?
- कविराज हो... तो कुछ फूल-फुंदने लगाईये न.
- क्या लगाऊं तुम्हारे सामने तो मैं ही फूल बन जाता हूं.
- फूल ?
- वही इंगलिश वाला फूल
- वेरी कूल वेरी कूल
- खुश
- बस...हो गई...थोड़ी सी
- तो अभी और बाकी है ?
- जी...अभी फुंदने बाकी है.
- तुम्हारी संतुष्टि के लिये तो स्वर्ग से देवता बुलाने पड़ेंगे.
- जी नहीं स्वर्ग के देवताओं की कोई आवश्यकता नहीं.
- क्यों ?
- क्यों की आप भी तो देवता हो न... मेरे पति देव हो.
- .................
- चुप क्यों हो गये? कुछ कहिये न
- .........................................
11.8.10
28.7.10
अभिनेता
सभी पाठकों को मेरा अभिवादन.प्रस्तुत है मेरी नई कविता.पढ़िये, आनंद लिजिये और हां अपनी टिप्पणी देना न भूलिये
अभिनेता
हीरो जी हाथ जोड़
ताली बजा रहे थे
गर्दन हिला हिला
भोले-भंडारी को
मना रहे थे
तभी एक
झमाका हुआ
महादेव जी
प्रगट हुए
बोले वर मांग
अभिनेता बोला
हे भगवन
आप हैं धन्य
आठ ही दिन
हुए आते
इतनी जल्दी
हो गये प्रसन्न
भगवान बोले
रे मूढ़ मति
मैं प्रसन्न नहीं
दुखी हूं
तू इधर बैठ
नाम मेरा जप रहा है
मेरे सामने ही
सेटिंग कर रहा है
मन में है
हीरोईन का ध्यान
भक्ति नहीं भक्ति की
एक्टिंग कर रहा है
जो मांगना है मांग
चलता बन
किंतु याद रहे
अब कभी आना नही
बोर हो गया
फिर से तेरी घटिया
एक्टिंग दिखाना नहीं
अभिनेता
हीरो जी हाथ जोड़
ताली बजा रहे थे
गर्दन हिला हिला
भोले-भंडारी को
मना रहे थे
तभी एक
झमाका हुआ
महादेव जी
प्रगट हुए
बोले वर मांग
अभिनेता बोला
हे भगवन
आप हैं धन्य
आठ ही दिन
हुए आते
इतनी जल्दी
हो गये प्रसन्न
भगवान बोले
रे मूढ़ मति
मैं प्रसन्न नहीं
दुखी हूं
तू इधर बैठ
नाम मेरा जप रहा है
मेरे सामने ही
सेटिंग कर रहा है
मन में है
हीरोईन का ध्यान
भक्ति नहीं भक्ति की
एक्टिंग कर रहा है
जो मांगना है मांग
चलता बन
किंतु याद रहे
अब कभी आना नही
बोर हो गया
फिर से तेरी घटिया
एक्टिंग दिखाना नहीं
8.6.10
रूठे रूठे पिया...मनाऊं कैसे
कुछ अनिवार्य कारणों से आपसे कई दिनों से मिल नहीं पाया.मेरी नई रचना का आनंद लिजिये.
एक बार हुआ यूं कि कविराज ने अपनी कविरानी से उनके मायके साथ चलने का वचन दिया था किंतु कुछ कारण वश नहीं जा सके. कविरानी बेचारी(?)अकेली चली गई और कविराज से रूठ गईं. कविराज ने उन्हे मनाने फोन लगाया और ये वार्तालाप हुआ.
- कैसी हो?
- अच्छी हूं.
- वो तो तुम हो ही, ये भी कोई कहने की बात है भला ?
- आपने पूछा इस करके बता रही हूं.
- क्या कर रही हो?
- सांस ले रही हूं.
- वो तो लेनी ही पड़ती है.
- कहो तो लेनी बंद कर दूं ?
- ओ यार मेरा ये मतलब नहीं था सांस लेने के अलावा
और क्या कर रही हो?
- पलकें भी झपका रही हूं.
- तुम ऐसी बातें क्यों करती हो
- अच्छा... आप कैसे हैं?
- अच्छा हूं.
- अपने मुंह मियां मिट्ठू
- क्या मैं अच्छा नहीं?
- तुम अच्छॆ नहीं, बहुत गन्दे हो.
- क्यों
- आये क्यों नहीं?
- अरे तुम्हें क्या बताऊं...
- कुछ भी बता दो...बता दो
- हे भगवान
- मुझे देखकर आप भगवान को क्यों याद करते हैं?
- मैं देख कहां रहा हूं केवल तुम्हें सुन रहा हूं.
- अच्छा जी जब मैं आपसे बात कर रही होती हूं तो
आप मुझे कल्पना में नहीं देखते?
- देखते हैं
- तो दिखती हूं न?
- वो तो...वो तो ऐसे है कि मैं भगवान को याद कर धन्यवाद करता हूं.
- काहे का धन्यवाद?
- यही कि हे प्रभु इतनी अच्छी पत्नी दी.
- अब मिल गई है न.बार बार भगवान को कष्ट क्यों देते हैं?
- उनसे प्रार्थना भी तो करता हूं.
- कैसी प्रार्थना?
- धन्यवाद करता हूं और और कहता हूं...
चलो जाने दो यार
- बताईये न...आपको मेरी कसम
- कहता हूं हे भगवान...जैसी अच्छी मिली है इसे वैसी ही अच्छी रखना.
- ओ...ह कोई काम है मुझसे ?
- क्यों?
- मक्खन क्यों लगा रहे हो?
- अब सच कहूं तो तुम विश्वास ही नहीं करती.
- अच्छा अच्छा यानी अभी सच कहा नहीं आपने
- क्यों नहीं कहा?
- क्योंकि मैं विश्वास नहीं करती
- मेरा मतलब है सच कहा तो भी तुम विश्वास क्यों नहीं करती?
- आप चाहते हैं आपकी इस बात पर मैं विश्वास कर लूं?
- मेरी अरजी तेरी मरजी.
- कवि हो न...बातें बनाना खूब आता है.
- मैं बनाता बातें तुम मुझे ही बना रही हो.
- आपको तो भगवान ने बना दिया है.भला मैं क्या बनाऊंगी?
- तुम एक भलेमानस को अमानुष बना रही हो.
- देखिये फोन पर कविता न करिये. पते की बात करिये.
- पते की बात सुन ही लो यदि तुम कल नहीं आई तो
मैं बेपता हो जाऊंगा
- हाय राम
- अभी नहीं तीन दिन बाद कहना.
- ओ मेरे सोना रे सोना रे सोनारे
- आ जाओ अब दूर नहीं रहना रे
एक बार हुआ यूं कि कविराज ने अपनी कविरानी से उनके मायके साथ चलने का वचन दिया था किंतु कुछ कारण वश नहीं जा सके. कविरानी बेचारी(?)अकेली चली गई और कविराज से रूठ गईं. कविराज ने उन्हे मनाने फोन लगाया और ये वार्तालाप हुआ.
- कैसी हो?
- अच्छी हूं.
- वो तो तुम हो ही, ये भी कोई कहने की बात है भला ?
- आपने पूछा इस करके बता रही हूं.
- क्या कर रही हो?
- सांस ले रही हूं.
- वो तो लेनी ही पड़ती है.
- कहो तो लेनी बंद कर दूं ?
- ओ यार मेरा ये मतलब नहीं था सांस लेने के अलावा
और क्या कर रही हो?
- पलकें भी झपका रही हूं.
- तुम ऐसी बातें क्यों करती हो
- अच्छा... आप कैसे हैं?
- अच्छा हूं.
- अपने मुंह मियां मिट्ठू
- क्या मैं अच्छा नहीं?
- तुम अच्छॆ नहीं, बहुत गन्दे हो.
- क्यों
- आये क्यों नहीं?
- अरे तुम्हें क्या बताऊं...
- कुछ भी बता दो...बता दो
- हे भगवान
- मुझे देखकर आप भगवान को क्यों याद करते हैं?
- मैं देख कहां रहा हूं केवल तुम्हें सुन रहा हूं.
- अच्छा जी जब मैं आपसे बात कर रही होती हूं तो
आप मुझे कल्पना में नहीं देखते?
- देखते हैं
- तो दिखती हूं न?
- वो तो...वो तो ऐसे है कि मैं भगवान को याद कर धन्यवाद करता हूं.
- काहे का धन्यवाद?
- यही कि हे प्रभु इतनी अच्छी पत्नी दी.
- अब मिल गई है न.बार बार भगवान को कष्ट क्यों देते हैं?
- उनसे प्रार्थना भी तो करता हूं.
- कैसी प्रार्थना?
- धन्यवाद करता हूं और और कहता हूं...
चलो जाने दो यार
- बताईये न...आपको मेरी कसम
- कहता हूं हे भगवान...जैसी अच्छी मिली है इसे वैसी ही अच्छी रखना.
- ओ...ह कोई काम है मुझसे ?
- क्यों?
- मक्खन क्यों लगा रहे हो?
- अब सच कहूं तो तुम विश्वास ही नहीं करती.
- अच्छा अच्छा यानी अभी सच कहा नहीं आपने
- क्यों नहीं कहा?
- क्योंकि मैं विश्वास नहीं करती
- मेरा मतलब है सच कहा तो भी तुम विश्वास क्यों नहीं करती?
- आप चाहते हैं आपकी इस बात पर मैं विश्वास कर लूं?
- मेरी अरजी तेरी मरजी.
- कवि हो न...बातें बनाना खूब आता है.
- मैं बनाता बातें तुम मुझे ही बना रही हो.
- आपको तो भगवान ने बना दिया है.भला मैं क्या बनाऊंगी?
- तुम एक भलेमानस को अमानुष बना रही हो.
- देखिये फोन पर कविता न करिये. पते की बात करिये.
- पते की बात सुन ही लो यदि तुम कल नहीं आई तो
मैं बेपता हो जाऊंगा
- हाय राम
- अभी नहीं तीन दिन बाद कहना.
- ओ मेरे सोना रे सोना रे सोनारे
- आ जाओ अब दूर नहीं रहना रे
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