9.10.09

सपना या सच

बंधुओं, चुनावों की ऋतु आ गयी है. कुछ प्रदेशों में तमाशा चालू आहे.
भिन्न भिन्न नेता मतदाताओं पर भिनभिना रहे हैं,लुभा रहे हैं.तरह तरह से ललचा रहे हैं साथ ही विपक्षियों पर भिन्ना रहे हैं.  
आजकल हम बूद्धू बक्से पर "सीरियल" नहीं देखते, नेताओं के भाषण सुनते हैं. इनमें अधिक "सस्पेंस" है. आज फलाने ने ढिलाने को चूहा कहा कल ढिलाना फलाने को क्या कहेगा? फिर सयाना की  प्रतिक्रिया क्या होगी?
लगता है जैसे अमका नेता और ढिमका नेता,  बंद नेता और चालू नेता, गरज ये के सभी नेता कह रहे हैं - समय बिताने के लिये... ओह क्षमा करें...
विजय पाने के लिये/करना है कुछ काम
खेलें आरोपों की अंताक्षरी/लेके मतदाता का नाम
सच मानिये यह सब देख सुन हमारा मन मनोरंजन से भर जाता है, ह्रदय भारी हो मस्तिष्क भरकम हो जाता है. 
एक हमारे मित्र हैं. नऐ-नऐ पत्रकार बने हैं.बेचारे आजकल रात दिन नेताजी के साथ "चिगी-विगी" कर रहे हैं जन सभाओं को "कवर" कर रहे हैं. नेता जी के संग-साथ से चार दिनों के प्रवास से उनके कोमल मन मस्तिष्क पर क्या बीती उन्होनें कविराज को बताई और हम आपको बताते है.
पढ़िये. 
सपना और सच
पत्रकार जी ने कहा 
कल देखा सपना  
चकित हूं  
कृपया इसका अर्थ 
बताईये 
कविराज बोले 
ऐसा क्या देख लिया 
सुनाईये 
पत्रकार बोले देखा मैंने
एक विशाल बरगद 
उस पर बैठे थे कौऐ 
कौओ का रंग था धवल श्वेत 
चोंचे खोल हंस रहे थे 
आश्चर्य की बात
मोती झड़ रहे थे   
कुत्ता और बिल्ली साथ साथ 
नाच रहे थे डुऐट गा रहे थे
मेंढक अपने आप को 
फुला रहे थे
टर्रा नहीं गुर्रा रहे थे
सांप डसना फुंकारना छोड
अपना फन सिकोड 
सीधे चल रहे थे
गाय को शेर            
प्यार से सहला रहे थे
हरी हरी घास दिखा रहे थे
इतना देखा बस
फिर मैं जग गया
कविराज ने ठहाका लगाया
बोले बंधु तुम्हारे सपने पर 
चुनावी प्रभाव है आया 
सपने का अर्थ ऐसा है
बरगद का वृक्ष हमारा भारत देश 
कौऐ नेता हैं 
चुनाव ऋतु है
श्वेत हो गये हैं
चोंच खोल भाषण दे रहे हैं
आश्वासन रूपी मोती झड रहे हैं
शेर नेताओं के गुर्गे हैं चमचे है
मना रहे हैं 
मतदाता गाय है 
और ये उसे पटा रहे हैं
कुत्ते और बिल्ली  
उत्तर दक्षिण हैं अर्थात
भिन्न भिन्न विचारधारा
वाले छोटे-मोटे दल
हो गया है जिनका तालमेल
मेंढक छोटे छोटे प्रांतीय दल हैं
स्वंय को फुला रहे है
भाव बडा रहे हैं
सांप दफ्तर हैं सरकारी अफ़सर हैं
सबका कार्य हो रहा है कर रहे हैं
इस अवसर पर सीधे चल रहे हैं
पत्रकार बोले वाह कविराज
आपने तो वाट लगा दी
सपने की पहेली सुलझा दी
कविराज बोले वो सपना था
अब आगे की सच्चाई सुनिये
बरगद तो वहीं रहेगा
कुछ पुराने कौऐ उड़ जायेंगे 
कुछ नऐ आ जायेंगे 
काले हो जायेंगे फिर से
पांच साल के लिये बस जायेंगे 
आज मोती झड़ रहे हैं
कल बीट गिरायेंगे
कुत्ते बिल्ली हर बात पर अड़ेंगे
फिर से लड़ेंगे झगड़ेंगे  
मेंढक इतना फूलेंगे कि 
टुकड़े भी नहीं मिलेंगे 
सांप फिर से गायों को 
डसने लगेंगे टेड़े चलने लगेंगे
शेर आयेंगे गाय को सतायेंगे 
वो रम्भायेगी 
कौऐ सुनेंगे समझायेंगे
निचोड़ेंगे दुहेंगे पियेंगे पिलायेंगे  
जब तक दूध देगी
कृपा करेंगे गाय को बचायेंगे
हमने कहा और इसके आगे
कविराज बोले इसके आगे तो
बंधु हमारी नियति ही बतायेगी
गाय जिसे तिसे दूध पिला रही है
पता नहीं इसे कब बुद्धि आयेगी
पता नहीं इसे कब बुद्धि आयेगी
.........................................
                         विजयप्रकाश

5 टिप्‍पणियां:

  1. विजय जी बहुत ही सुन्दर कविता है। गाय को बुद्धी हो तो भी जान बूझ कर हर ऐरे गैरे को दूध पिलाना इसकी नियती है, उस से कैसे बचेगी।

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  2. AAP KO DHER SARI SUBHKAMNAYEN AAP KA PRAYAS BAHUT ACCHA HAI. SABHI PRASNG BAHUT ACHE LAGE.BHAVISHYA ME BHI AUR ACHE PRASANG KAVITA KE MADHYAM SE HAM TAK PAHUNCHANE KE LIYE HAM ISHWAR SE FARIYAD KARTE HAIN KI AAP KO HAR TARAH SE SAFALTA PRADAN KARE.

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  3. बहुत बढिया । इसके पहले वाली चैट पोस्ट बहुत मजेदाह है ।

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  4. नेता जी के संग-साथ से चार दिनों के प्रवास से उनके कोमल मन मस्तिष्क पर क्या बीती उन्होनें कविराज को बताई और हम आपको बताते है.
    waah komal man mein to sare jiv jantu on ne dhmaa chokdimcha di ....!!

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  5. आजकल हम बूद्धू बक्से पर "सीरियल" नहीं देखते, नेताओं के भाषण सुनते हैं. इनमें अधिक "सस्पेंस" है. आज फलाने ने ढिलाने को चूहा कहा कल ढिलाना फलाने को क्या कहेगा? फिर सयाना की प्रतिक्रिया क्या होगी?

    विजय पाने के लिये/करना है कुछ काम
    खेलें आरोपों की अंताक्षरी/लेके मतदाता का नाम

    धन्य हैं भाई आप, मज़ा ला दिया.........

    चन्द्र मोहन गुप्त
    जयपुर
    www.cmgupta.blogspot.com

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