22.10.09

क्यों प़टाखे फुस्स इनके क्यों बुझ गये दिये

चलिये दीपावली हो गयी चुनाव भी हो गये हार जीत के परिणाम भी आ गये.
हार ... क्या विचित्र वस्तु है हार. लिंग बदलते ही अर्थ बदल जाते हैं किसी के गले पड़ा,
किसी के गले पड़ी. विजयी की जय जय हारे को हरि नाम
हम आपको एक "हारे" नेता की बात बताते है आईये आपको "फ्लैश बेक" में ले जाते हैं.
कई वर्ष पूर्व ये नेता राय साब के पास आये थे. बोले अगले चुनाव में विजयी होना चाहता हूं
आपकी राय चाहिये कोई मंत्र दिजिये.
राय साब बोले सेवा और सेवा, यही विजय का मूल मंत्र है.आप चुनाव तक केवल सेवा ही करते रहें।
सेवा से ही मेवा मिलेगा.
नेता बोले प्रश्न उठता है सेवा किसकी करें?
राय साब बोले आपके मन में भी प्रश्न उठते हैं? वैसे आप चुनिये किसकी सेवा करना उचित रहेगा-
जनता की? हाई कमांड की? प्रदेश अध्यक्ष की? भूतपूर्व की? वर्तमान की? ईंडस्ट्रियलिस्ट की? बाबा की? ज्योतिषी की?
नेता जी बोले आप ही सुझाईये
राय साब बोले अरे भई थोड़ी कम थोड़ी अधिक, इसकी उसकी, सबकी सेवा करते रहें, तभी तो लहर किनारे लगेगी.
नेता जी प्रसन्न हो गये, अभिवादन किया और निकल पड़े.
उन्होने मूलमंत्र याद रखा, सबकी बहुत सेवा की, टिकट पाया, चुनाव-समर में आये.
किंतु...बेचारे सबकी सेवा में इतने व्यस्त हो गये कि समय ही नहीं मिला और केवल जनता की सेवा ही भूल गये.
फिर ये तो होना ही था जनता भी इन्हें मतदान के समय...
यहां पर आपकी हमारी बात पूरी होती है
क्यों प़टाखे फुस्स इनके क्यों बुझ गये दिये
क्योंकि इन्हें मतदाताओं ने मत नहीं दिये
.





2 टिप्‍पणियां:

  1. bahut achcha vyang...

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